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अष्टांग योग क्या है? महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए योग के 8 अंग और उनके लाभ

Posted on July 17, 2026July 17, 2026 By Divyadarshanyog No Comments on अष्टांग योग क्या है? महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए योग के 8 अंग और उनके लाभ
Yoga & Meditation

अष्टांग योग: स्वस्थ, संतुलित और सफल जीवन का आधार

भारतीय योग परंपरा में अष्टांग योग का विशेष महत्व है। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित, स्वस्थ, संतुलित और आध्यात्मिक रूप से उन्नत बनाने की एक संपूर्ण पद्धति है। अष्टांग योग के माध्यम से व्यक्ति अपने शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

महर्षि पतंजलि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ योगसूत्र में अष्टांग योग के आठ अंगों का वर्णन किया है। ये आठ अंग व्यक्ति को नैतिकता, आत्म-अनुशासन, मानसिक शांति और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।


महर्षि पतंजलि कौन थे?

महर्षि पतंजलि भारतीय योग दर्शन के महान ऋषि और योगशास्त्र के प्रणेता माने जाते हैं। उन्होंने योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से पतंजलि योगसूत्र में संकलित किया, जो विश्वभर में योग का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

महर्षि पतंजलि ने योग को केवल आसनों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मन, बुद्धि, चरित्र और आत्मा के विकास का संपूर्ण विज्ञान बताया। उनके द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग आज भी योग साधकों के लिए मार्गदर्शक है।


अष्टांग योग क्या है?

“अष्टांग” का अर्थ है “आठ अंग”। अष्टांग योग में योग साधना के आठ चरण बताए गए हैं, जिनका पालन करके व्यक्ति शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।

पतंजलि योगसूत्र के अनुसार:

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”

अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है।


अष्टांग योग के 8 अंग (Eight Limbs of Ashtanga Yoga)

1. यम (Yama) – सामाजिक और नैतिक अनुशासन

यम जीवन के नैतिक सिद्धांत हैं जो व्यक्ति को समाज में आदर्श व्यवहार करना सिखाते हैं।

यम के पाँच प्रकार

  • अहिंसा – किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट न देना।
  • सत्य – सत्य बोलना और सत्य का पालन करना।
  • अस्तेय – चोरी न करना और दूसरों की वस्तु की इच्छा न करना।
  • ब्रह्मचर्य – इंद्रियों और ऊर्जा पर नियंत्रण रखना।
  • अपरिग्रह – अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना।

यम के लाभ

  • चरित्र निर्माण
  • सामाजिक सम्मान
  • मानसिक शांति
  • सकारात्मक व्यक्तित्व विकास

2. नियम (Niyama) – व्यक्तिगत अनुशासन

नियम व्यक्ति के आंतरिक विकास और आत्मशुद्धि से संबंधित हैं।

नियम के पाँच प्रकार

  • शौच – बाहरी और आंतरिक शुद्धता।
  • संतोष – जो प्राप्त है उसमें प्रसन्न रहना।
  • तप – अनुशासन और आत्मसंयम।
  • स्वाध्याय – आत्मचिंतन और आध्यात्मिक अध्ययन।
  • ईश्वर प्रणिधान – ईश्वर के प्रति समर्पण।

नियम के लाभ

  • आत्मविश्वास में वृद्धि
  • मानसिक संतुलन
  • सकारात्मक सोच
  • आध्यात्मिक विकास

3. आसन (Asana) – शरीर को स्वस्थ और स्थिर बनाना

आसन अष्टांग योग का तीसरा अंग है। इसका उद्देश्य शरीर को स्वस्थ, मजबूत और ध्यान के योग्य बनाना है।

पतंजलि कहते हैं:

“स्थिरसुखमासनम्”

अर्थात् जो स्थिति स्थिर और सुखद हो वही आसन है।

आसन के लाभ

  • शरीर में लचीलापन
  • मांसपेशियों की मजबूती
  • बेहतर रक्त संचार
  • शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार

4. प्राणायाम (Pranayama) – श्वास का विज्ञान

प्राणायाम श्वास को नियंत्रित करने की योगिक प्रक्रिया है। यह शरीर में प्राण ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करता है।

प्राणायाम के लाभ

  • फेफड़ों की क्षमता में वृद्धि
  • तनाव और चिंता में कमी
  • मानसिक एकाग्रता
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार

5. प्रत्याहार (Pratyahara) – इंद्रियों पर नियंत्रण

प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर केंद्रित करना।

प्रत्याहार के लाभ

  • मानसिक शांति
  • आत्मनियंत्रण
  • ध्यान की तैयारी
  • विकर्षणों में कमी

6. धारणा (Dharana) – एकाग्रता का विकास

धारणा का अर्थ है मन को किसी एक लक्ष्य, मंत्र, चक्र या विचार पर स्थिर करना।

धारणा के लाभ

  • स्मरण शक्ति में वृद्धि
  • निर्णय क्षमता में सुधार
  • मानसिक शक्ति का विकास
  • अध्ययन और कार्य में बेहतर प्रदर्शन

7. ध्यान (Dhyana) – गहन मेडिटेशन

जब मन लंबे समय तक बिना भटके किसी एक विषय पर स्थिर रहता है, तो वह ध्यान कहलाता है।

ध्यान के लाभ

  • तनाव से मुक्ति
  • भावनात्मक संतुलन
  • सकारात्मक सोच
  • गहरी मानसिक शांति

8. समाधि (Samadhi) – योग की सर्वोच्च अवस्था

समाधि अष्टांग योग का अंतिम और सर्वोच्च चरण है। इस अवस्था में साधक आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव करता है।

समाधि के लाभ

  • आत्मसाक्षात्कार
  • आध्यात्मिक जागरण
  • परम आनंद की अनुभूति
  • आंतरिक स्वतंत्रता

अष्टांग योग के लाभ

नियमित अष्टांग योग अभ्यास से व्यक्ति को अनेक शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

✔ शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बनता है।
✔ तनाव, चिंता और अवसाद कम होते हैं।
✔ एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
✔ आत्मविश्वास और सकारात्मकता विकसित होती है।
✔ जीवन में अनुशासन और संतुलन आता है।
✔ आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।


आधुनिक जीवन में अष्टांग योग का महत्व

आज की व्यस्त जीवनशैली में तनाव, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, मानसिक अस्थिरता और जीवनशैली संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में अष्टांग योग व्यक्ति को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, मानसिक संतुलन बनाए रखने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का प्रभावी मार्ग प्रदान करता है।


निष्कर्ष

अष्टांग योग महर्षि पतंजलि द्वारा दिया गया एक अमूल्य उपहार है। इसके आठ अंग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—मानव जीवन के समग्र विकास का मार्ग दिखाते हैं। यदि इन सिद्धांतों को दैनिक जीवन में अपनाया जाए, तो व्यक्ति न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ बल्कि मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध बन सकता है।

अष्टांग योग वास्तव में स्वस्थ जीवन, मानसिक शांति और आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाली एक पूर्ण योग साधना है।


दिव्यदर्शन योग सेवा संस्थान (DDY)
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